झारखण्ड बोकारो

केंद्रीय विद्यालय बोकारो 1 में जनजातीय गौरव दिवस समारोह का समापन

बोकारो (ख़बर आजतक): सेक्टर 4 स्थित केंद्रीय विद्यालय बोकारो 1 में शनिवार को जनजातीय गौरव दिवस का समापन समारोह कार्यक्रम आयोजित किया गया। 15 दिनों से चल रहे इस जनजातीय गौरव दिवस कार्यक्रम की शुरुआत केंद्र सरकार के पहल पर अखिल भारतीय स्तर पर की गई है। देशभर में जनजातियों की परंपरा उनके इतिहास उनकी संस्कृति एवं उनके वैशिष्ट्य को लेकर के जन जागरूकता फैलाना इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य रहा है।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि समाजसेवी योगो पूर्ति थे। योगो पूर्ति एक ऐसे शख्स हैं जिन्होंने बोकारो के सतनपुर क्षेत्र में जंगल को बचाने में अपना अनमोल योगदान दिया। बोकारो के सतनपुर क्षेत्र में भूमाफियाओं की पैनी नजर जंगल की जमीन पर थी। सपाट किए जाते हुए जंगलों को देखकर प्रखर पर्यावरणविद श्री पूर्ति ने आंदोलन का बीड़ा उठाया और वहां से जंगल को कटने से बचा लिया। ऐसे ही पर्यावरणवादी को केंद्रीय विद्यालय 1 में मुख्य अतिथि के रूप में जनजाति गौरव दिवस समारोह में आमत्रित किया गया था। मांदर की थाप पर धुन बजाकर इन्होंने जनजाति संस्कृति को विद्यालय प्रांगण में जीवत कर दिया। अपने वक्तव्य में मुख्य अतिथि श्री पूर्ति ने छात्रों को संबोधित करते हुए बताया कि झारखंड की भूमि ऐसे ही लालों से भरी है। इतिहास में कितने ही ऐसे वीर हो गए जिन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान तो दे दिया परंतु इतिहास की किताब में कहीं उन्हें जगह नहीं मिली। आज केंद्र सरकार धन्यवाद की पात्र है जिन्होंने जनजाति गौरव को उत्सव का विषय बनाया। विद्यालय के प्राचार्य मनोज कुमार ने कहा कि आदिवासियों की संस्कृति को अगर आत्मसात कर लिया जाए तो देश भर में घृणा और द्वेष स्वतः समाप्त हो जाएगे। आवश्यकता है तो बस इस बात की कि जनजातियों के संबंध में जनचेतना को जन-जन का गौरव बना दिया जाए। 15 दिनों से चल रहे इस कार्यक्रम में प्रतिदिन प्रातः कालीन सभा में आदिवासी सभ्यता और संस्कृति की छवि प्रस्तुत करती हुई एक-एक झांकी जनचेतना जगाने के लिए पर्याप्त की। शिक्षकों में बीएस पूर्ति, पवन उरांव, कमला मिंज एवं संतोष कुमार पांडेय ने प्रत्येक दिन झारखंड के गौरव रहे सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव इन स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही फूलो और झानो, बाबा तिलका मांझी, टाना भगत, भगवान बिरसा मुंडा के बारे में छात्रों के बीच में विस्तार से बताया गया। इस मौके पर शिक्षक श्री पूर्ति ने कि आदिवासी जन्मजात स्वतंत्रता प्रेमी होते हैं। उन्हें गुलामी कतई पसंद नहीं। गुलामी और मृत्यु में वह मृत्यु का वर्णन करना श्रेयस्कर समझते हैं। यह आदिवासी ही हैं जिनके सर्वोच्च बलिदान के कारण 1857 के सिपाही विद्रोह से एक वर्ष पहले पानी 1856 को छोटानागपुर क्षेत्र से अंग्रेजों का सफाया हो गया था। श्री उरांव ने कहा कि आदिवासी जनजाति प्रकृति पूजक होते हैं। प्रकृति से प्रेम करना इनके खून में शामिल है। वहीं विद्यालय के छात्रों द्वारा मनमोहन आदिवासी नृत्य और संगीत प्रस्तुत किया गया। विद्यालय की संगीत शिक्षिका मंजरी श्रीवास्तव ने आदिवासी नृत्य तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके प्रयासों से आदिवासी संस्कृति के नृत्य और गीत विद्यालय में गूंज उठे।

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